Saturday, February 22, 2014

बाएं से दायें  चित्र का परिचय
मेरी मामी सब से बाएं इनको क्रोनिक आर्थराइटिस है जिसके कारण अब इनका उठा बैठना मुश्किल हो रहा है.
बीच में मेरी ममेरी बहन -रीना . इसकी शादी हो गई है आजकल दिल्ली में रहती है. सबसे दायें मेरी मां . कैंसर रोग के कारण इनकी मृत्यु दिनांक २७.०८.२०१३ को हो गया. मुझे in सबकी बड़ी याद आती है.
माँ  मुझे अब माँ कहने से भी रुलाई आती है.

Thursday, March 28, 2013


पैगंबर हज़रत मोहम्मद के इस्लाम के असली वारिस कौन?

AddThis Social Bookmark Button

निर्मल रानी

पिछले दिनों पूरे विश्व में मोहर्रम के अवसर पर हज़रत इमाम हुसैन की शहादत की याद को ताज़ा करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। भारत में भी इस अवसर पर तरह-तरह के गमगीन आयोजन किए गए। इस वर्ष पहली बार मुझे भी बिहार के दरभंगा जि़ले में स्थित अपने गांव में मोहर्रम के दौरान रहने का अवसर मिला। यहां नवीं व दसवीं मोहर्रम के दिन अर्थात् मोहर्रम के शोकपूर्ण आयोजन के दो प्रमुख दिनों के दौरान कुछ अजीबोगरीब नज़ारे देखने को मिले जिन्हें अपने पाठकों के साथ सांझा करना चाहूंगी।

मोहर्रम के जुलूस में जहां शिया समुदाय के लोग अपना खून अपने हाथों से बहाते,अपने सीने पर मातम करते, हज़रत इमाम हुसैन की याद में नौहे पढ़ते तथा ज़ंजीरों व तलवारों से सीनाज़नी करते हुए अपने-अपने हाथों में अलम, ताबूत व ताजि़ए लेकर करबला की ओर आगे बढ़ रहे थे वहीं इसी जुलूस को देखने वालों का भारी मजमा भी मेले की शक्ल में वहां मौजूद था। ज़ाहिर है इस भीड़ में अधिकांश संख्या उन पारंपरिक दर्शकों की थी जो इस अवसर पर प्रत्येक वर्ष इस जुलूस को देखने के लिए दूर-दराज से आकर यहां एकत्रित होते हैं। अधिकांश मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से होकर गुज़रने वाले इस जुलूस में भारी पुलिस प्रबंध, आला प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी तथा दंगा निरोधक दस्ते के विशेष पुलिस वाहन देखकर सहसा मुझे उत्सुकता हुई कि आिखर इमाम हुसैन का गम मनाने वालों तथा उनके नाम पर अपना खून व आंसू बहाने वालों को किस धर्म या जाति या समुदाय विशेष के लोगों से खतरा हो सकता है जिसके कारण इतने प्रशासन को भारी पुलिस बंदोबस्त करने पड़े? इसके पूर्व मैंने दिल्ली व इलाहाबाद जैसे शहरों में भी मोहर्रम के जलसे व जुलूस आदि बहुत निकट से देखे हैं। परंतु इस प्रकार दंगा निरोधक दस्ते के रूप में विशेष सुरक्षा बलों की तैनाती इत्तेफाक से कहीं नहीं देखी। जब इस पुलिस बंदोबस्त के कारणों की पड़ताल की गई तो पता यह चला कि हिंदू समुदाय के लेाग जहां मोहर्रम के अवसर पर जुलूस में अपना पूरा सहयोग देते हैं तथा जुलूस के अंत तक साथ-साथ रहते हैं वहीं इसी गांव के कुछ वहाबी सोच रखने वाले मुस्लिम समुदाय के ही लोग हज़रत इमाम हुसैन की शहादत की याद में निकाले जाने वाले इस जुलूस का विरोध करने का प्रयास करते हैं। गोया मोहर्रम के इस शोकपूर्ण आयोजन को किसी दूसरे धर्म-जाति या समुदाय से नहीं बल्कि स्वयं को वास्तविक मुसलमान बताने वाले वहाबी वर्ग के लोगों से ही सबसे बड़ा खतरा है।

जब 10 मोहर्रम का यह जुलूस नौहा-मातम करता हुआ पूरे गांव का चक्कर लगाने के बाद इमामबाड़ा होते हुए करबला की ओर चला तो बड़े ही आश्चर्यजनक ढंग से इस जुलूस में हिंदू समुदाय के लोगों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। इमामबाड़े के आगे से जुलूस का सबसे अगला छोर हिंदू समुदाय के लोगों ने ढोल नगाड़े व मातमी धुनें बजाने वाले साज़ के साथ संभाला तो हिंदुओं के एक दूसरे ग्रुप ने ‘झरनी’ क ेनाम से प्रसिद्ध मैथिली भाषा में कहा गया शोकगीत पढऩा शुरु किया। अपने दोनों हाथों में डांडियारूपी डंडे लिए लगभग आधा दर्जन हिंदू व्यकित शोक धुन के साथ झरनी पढ़ रहे थे। पता चला कि हिंदू समुदाय के लोग गत् सैकड़ों वर्षों से इस गांव में इसी प्रकार शिया समुदाय के साथ मिल कर जुलूस की अगवानी करते हैं तथा मैथिली भाषा में झरनी गाकर शहीद-ए-करबला हजऱत इमाम हुसैन को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। निश्चित रूप से सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल पेश करने वाले ऐसे वातावरण की ही देन है कि इस क्षेत्र में आज तक कभी भी हिंदू-मुस्लिम तनाव देखने को नहीं मिला। जबकि वहीं पर शिया व सुन्नी समुदाय के बीच मधुर संबंध होने के बावजूद कुछ ऐसी शक्तियां तेज़ी से सिर उठाती जा रही हैं जोकि पारंपरिक सद्भाव को ठेस पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं।

इस तनावपूर्ण वातावरण को देखकर ज़ेहन में यह सवाल भी उठा कि आख़िर वहाबियत के पैरोकार हज़रत हुसैन की शहादत पर गम क्यों नहीं मनाते? आख़िर वहाबी विचारधारा के लोग भी तो हज़रत मोहम्मद के उतने ही बड़े चाहने वाले हैं जितने कि अन्य मुस्लिम वर्गों के लोग स्वयं को बताते हैं? यदि करबला की घटना का जायज़ा लिया जाए तो सीधेतौर पर यह नज़र आता है कि स्वयं को मुस्लिम शासक कहने वाले यज़ीद के लाखों की संख्या के सशस्त्र सीरियाई सैनिकों ने चौदह सौ वर्ष पूर्व पैगंबर हज़रत मोहम्मद के नवासे तथा चौथे इस्लामी खलीफा हज़रत अली के पुत्र हज़रत इमाम हुसैन के छोटे से परिवार को बड़ी ही बेरहमी व बेदर्दी के साथ करबला के मैदान में केवल इसीलिए शहीद कर दिया था क्योंकि हज़रत इमाम हुसैन यज़ीद जैसे दुष्ट,क्रूर तथा अपराधी व पापी प्रवृति के शासक को सीरिया जैसे इस्लामी देश के सिंहासन पर बैठने की धार्मिक मान्यता नहीं दे रहे थे। ज़ाहिर है हज़रत इमाम हुसैन इस दूरअंदेशी के साथ ही ऐसा निर्णय ले रहे थे ताकि भविष्य में उनपर यह इल्ज़ाम न आने पाए कि उन्होंने यज़ीद जैसी गैर इस्लामी सोच रखने वाले दुष्ट शासक को इस्लामी साम्राज्य के बादशाह के रूप में मान्यता देकर इस्लाम को कलंकित व अपमानित कर दिया। वे इस्लाम को हज़रत मोहम्मद के वास्तविक व उदारवादी तथा परस्पर सहयोग की भावना रखने वाले इस्लाम के रूप में दुनिया के समक्ष पेश करना चाहते थे। हज़रत हुसैन की बेशकीमती कुर्बानी के बाद हुआ भी यही कि यज़ीद करबला की जंग तो ज़रूर जीत गया परंतु एक राक्षस व रावण की तरह उसके नाम का भी अंत हो गया। जिस प्रकार आज दुनिया में कोई अपने बच्चे का नाम रावण रखना पसंद नहीं करता उसी प्रकार कोई माता-पिता अपने बच्चे का नाम यज़ीद भी नहीं रखते।

फिर
आखिर वहाबियत की विचारधारा गम-ए-हुसैन मनाने का विरोध क्यों करती है? वहाबियत क्यों नहीं चाहती कि यज़ीद के दु:स्साहसों, उसकी काली करतूतों तथा उसके दुष्चरित्र को उजागर किया जाए तथा हज़रत इमाम हुसैन की अज़ीम कुर्बानी के कारणों को दुनिया के सामने पेश किया जाए? मैंने इस विषय पर भी गहन तफ्तीश की। वहाबियत के पैरोकारों ने अपने पक्ष में कई दलीलें पेश कीं। स्थानीय स्तर पर सुनी गई उनकी दलीलों का हवाला देने के बजाए मैं यहां वहाबी विचारधारा के देश के सबसे विवादित व्यक्ति ज़ाकिर नाईक के विचार उद्धृत करना मुनासिब समझूंगी। ज़ाकिर नाईक यज़ीद को न केवल सच्चा मुसलमान मानते हैं बल्कि उसे वह जन्नत का हकदार भी समझते हैं। ज़ािकर यज़ीद को बुरा-भला कहने वालों, उस पर लानत-मलामत करने वालों की भी आलोचना करते हैं। नाईक के अनुसार यज़ीद मुसलमान था और किसी मुसलमान पर दूसरे मुसलमान को लानत कभी नहीं भेजनी चाहिए। वहाबियत के भारत के प्रमुख स्तंभ व मुख्य पैरोकार समझे जाने वाले ज़ाकिर नाईक के यज़ीद के विषय में व्यक्त किए गए विचारों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वहाबियत कैसी विचारधाराओं की पोषक है? यज़ीदियत की या हुसैनियत की? यहां ज़ाकिर नाईक के या यूं कहा जाए कि वहाबियत के पैराकारों के मुताबिक तो अजमल कसाब, ओसामा बिन लाडेन, एमन अल जवाहिरी तथा हाफ़िज़ सईद जैसे मानवता के पृथ्वी के सबसे बड़े गुनहगारों को भी सिर्फ इसलिए बुरा-भला नहीं कहा जाना चाहिए क्योंकि यह मुसलमान हैं?

वहाबी समुदाय के लोगों के मोहर्रम के जुलूस का विरोध करने के इन प्रयासों के बाद मेरी समझ में आया कि आख़िर पाकिस्तान,इराक और अफगानिस्तान में क्योंकर मोहर्रम के जुलूसों पर आत्मघाती हमले होते हैं? क्यों इमामबाड़ों, शिया, अहमदिया व बरेलवी समुदाय की मस्जिदों,दरगाहों व इमामबाड़ों को आत्मघाती हमलों का निशाना बनाया जाता है? दुनिया को भी यह समझने में अधिक परेशानी नहीं होनी चाहिए कि वास्तव में इस्लाम को हिंसा के रास्ते पर ले जाने वाली शक्तियां यज़ीद से लेकर अजमल कसाब तक तथा उस समय के यज़ीद के पैरोकारों से लेकर कसाब को जन्नत भेजने की कल्पना करने वालों तक कौन हैं? केवल संख्या बल के आधार पर किसी फैसले पर पहुंचना मुनासिब नहीं है। हुसैनियत उस इस्लाम का नाम है जिसने सच्चाई के रास्ते पर चलते हुए एक क्रूर, शक्तिशाली शासक का डटकर विरोध कर इस्लाम के वास्तविक स्वरूप की रक्षा करने के लिए अपने परिवार के 72 सदस्यों को एक ही दिन में करबला में कुर्बान कर दिया और इस्लाम की आबरू बचा ली। जबकि यज़ीदियत इस्लाम के उस स्वरूप का नाम है जहां सत्ता व सिंहासन के लिए ज़ुल्म है, जब्र है, आतंक व हिंसा है तथा अपनी बात जबरन मनवाने हेतु खूनी खेल खेले जाने की एक पुरानी परंपरा है। अब इन में से इस्लाम का एक ही स्वरूप सत्य हो सकता है दोनों हरगिज़ नहीं। बेहतर हो कि इसका निष्पक्ष निर्णय दूसरे धर्म एवं समुदाय के पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवी तथा चिंतक करें न कि वहाबियत, शिया, बरेलवी या अहमदिया समुदाय से संबंध रखने वाले मुल्ला-मौलवी लोग।

Monday, May 21, 2012


Raam currency

RAAM, or Raam is a bearer bond and local currency issued by Stichting Maharishi Global Financing Research (SMDFR), a charitable foundation based in MERU, Holland. It is also the "global development currency" of the Global Country of World Peace (GCWP). It was designed to be a flexible currency for national governments to use in the development of agricultural projects with the goal of eliminating poverty in third world countries. The Raam was launched on October 26, 2001 and is the concept of Maharishi Mahesh Yogi, founder of the Transcendental Meditation technique and the Global Country of World Peace.

Usage and purpose

According to Benjamin Feldman, the Minister of Finance for the Global Country of World Peace: "There are 1.5 billion people living in extreme poverty and currencies like the US dollar are not available to most of them. The Raam can be used to build new houses, roads, schools and health clinics". Feldman states that the idea is to start 3,000 farms in undeveloped areas, have the farmworkers paid in the new currency, and then have that currency converted to hard currency when the farms began exporting to world markets. According to Maharishi Global Financing, agreements were made in 2004 with a farmers' association in South America and with traditional leaders in Africa to start using the Raam for agricultural development projects. CATO Institute currency expert James Dorn expressed doubt about the viability of the plan, suggesting that other economic approaches would be a better way to establish the network of collective farms envisioned by the Raam project. As of March, 2004, there was no information available about the Raam development projects, what projects had actually been started, or whether there were any results from the first 2½ years of the project.
The Raam differs from other complimentary currencies because its focus is on the export of products―in this case organic agricultural products from third world growers to consumers in developed countries―rather than improving local circulation to benefit the lives of local people. Other developmental currencies instead focus on local and regional self-development.

Denominations and terms

The Raam is a bearer bond that earns a total of 3% interest after five years (.06% simple interest annually).
It is issued in denominations of 1, 5 and 10 Raams, with one Raam equal to 10 Euros in Europe, and one Raam equal to 10 dollars in the U.S. Raam notes are printed by Joh. Enschedé.

Circulation

The Raam is currently used alongside Euros in accordance with Dutch law in more than 100 shops in the Netherlands. Shops associated with department store chains in 30 villages and cities have begun accepting the currency as payment for goods and services. The Raam is convertible in Holland at the Fortis Bank in Roermond, Holland. As of 2003, the Dutch Central Bank estimated that there were approximately 100,000 Raam notes in circulation.
The Raam is also in use in Maharishi Vedic City, Iowa.The Maharishi Vedic City Raam is identical to the Dutch one except for a small yellow stamp "Maharishi Vedic City". In 2002, Maharishi Vedic City Mayor Bob Wynne estimated that there was $40,000 worth of Raam in circulation.
The Raam is accepted at Maharishi University of Management and a few businesses in nearby Fairfield. However, local banks, Jefferson County officials and other local businesses do not accept the currency. The Jefferson County Board of Supervisors passed a resolution requiring that property taxes be paid in dollars, to preclude homeowners from attempting to pay in Raam. The First National Bank of Fairfield initially agreed to accept the Raam and exchange it for dollars, but stopped after a few weeks because of discomfort in monitoring the alternative currency on a daily basis, and potentially being stuck with worthless Raam.
It is unclear as to how the Raam will circulate in the other countries, since 1 Raam is worth 10 Euro, and there are no smaller denominations

Tuesday, May 1, 2012


Up-gradation of Grade Pay of Inspector (Posts) from Rs. 4200/- to Rs. 4600/-.


It is learnt that, Postal Directorate has cleared the up-gradation of Grade Pay of Inspector (Posts) file and submitted to Ministry of Finance with positive note.
This Association thanks to all the Senior Officers of Postal Directorate for extending their help and support.

Saturday, April 21, 2012

एक अप्रैल २०१२
आज के दिन  मेरा पैर सीढ़ी से गिरने के कारन टूट गया .   डाक्टर आर दी त्रिपाठी ने प्लास्टर किया . अब १५ मई को प्लास्टर खुलेगा. तब तक आराम कर रहा हूँ .

Sunday, December 11, 2011

SI EXAM KI COPY KI PARCEL KARAI

AAJ 11.12.11 HAI. MAH KA 11 TAREEKH. AAJ SUB INSPECTOR POLICE KI PARIKCHA THI. CENTRE KUL MILAKAR 12. LEKIN PARCEL BOOK KARANE AYE LOGON KA HAL ................................................
'
PAARCEL BOOK KARANE KE LIYE TAHSEELDAR, KENDRA VYASTHAPAK YANI PRINCIPAL TATHA UNKE SATH PURA AMLA AAYAA.

DAKGHAR KI TARAF SE SASHI KUMAR, AKCHAY, RAM KEWAL MISHRA, ARUN BHARTI, K. N. TIWARI (POSTMASTER)

SBSE BADHKAR ANANT RAM WO BHI PEEKAR PANI NAHI DARU.
12 PARCEL 120 BOOK KARANE WALE. IGO TAHSEELDAR HONE KA DY SP HONE KA ALAG SE.
KUCH KO APNI RD TRANSFER KARANE KA IDEA POOCHNE KA MAN HUWA TO POONCH HI LIYA
PARCEL KHAJANE ME BAND HONA HAI TO ANAND SHANKAR MISHRA KE BINA ADHURA KAM. APM SRI R K MISHRA NE MOBILE DIKHAYA MISRA JI NE 1709 PAR MUJHE FONE KAR PARCEL BOOK KARANE KE BARE ME POONCHA THA. MISRA JI KO PARESAN KARNE KA ISSE ACHHA TAREEKA KYA HO SAKTA THA POSTMATER SAHAB NE FONE MILAYA AUR SARA HAL BATYA . MISRA JI KAISE AAYEN ISKE LIYE KHUSUR PHUSUR HONE LAGA . PAHLE YE TAY HUWA CHABHI LE AYA JAI LEKIN BAAT PAKKI NAHI HUI AB BHARTI KO BHEJKAR MISRA JI KO LANE KA PROGRAMME PAKKA KIYA GAYA.